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सोमवार, 21 सितंबर 2020

समझें युधिष्ठिर ने सूर्य देव से अक्षय पात्र कैसे प्राप्त किया?

Sandeep sihare

शनिवार, 19 सितंबर 2020

परम सत्य भाग -२

Sandeep sihare








यह वीडियो महा नारायण उपनिषद के दूसरे अध्याय पर आधारित है।

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

जानिए ब्रह्मा ,विष्णु एवम् महेश के माता एवम् पिता कौन हैं ?

Sandeep sihare

भगवान सदाशिव एवम् श्री देवी के चरणों में मेरा प्रणाम

शेरावाली माता के पति कौन हैं ? 


ब्रह्मा ,विष्णु एवम् महेश के पिता कौन हैं ?
शिवलोक के देवता कौन हैं ? शेरावाली माता अपनी मांग में किसके नाम का सिंदूर लगाती हैं ?

 आदि प्रश्न इंटरनेट पर ज्यादा वायरल हो रहे हैं।
अत: इसका उत्तर ये रहा।
शेरवाली माता के स्वामी भगवान सदाशिव हैं ,इस बात को समझने हेतु इस लेख को पढ़ें।

परब्रह्म परमात्मा महेश्वर की जो आद्य सनातनी शक्ति हैं,वे उमा नाम से विख्यात हैं।वे ही त्रिलोक को उत्पन्न करने वाली पराशक्ति हैं।श्री उमा देवी का एक अन्य लोक भी है,जो सर्वलोक अर्थात मणि द्वीप नाम से विख्यात है।
दक्ष प्रजापति की कन्या सती  तथा हिमालय की पुत्री पार्वती - यह दो शिवा देवी के अवतार हैं।देवी उमा निराकार एवम् निर्विकार होकर भी देवों का दुख दूर करने हेतु साकार रूप धारण करती हैं।उनका शरीर धारण करना, उनकी इच्छा का वैभव कहा गया है।वे लीला से इसलिए प्रकट होती हैं ताकि भक्त जन उनके गुणों का गान कर उत्तम गति प्राप्त कर सकें।
अन्य अवतार इस प्रकार हैं। 

मधु कैटभ के युद्ध में श्री हरि की सहायक महाकाली ,महिषासुर का वध करने वाली महालक्ष्मी ,जो समस्त देवो के सम्मिलित तेज से उत्पन्न हुई।
एवम् गौरी के शरीर से उत्पन्न देवी कौषिकी ,जिसने शुंभ एवम्  निशुंभ  से देवताओं को मुक्ति दिलाई।
इसके अलावा दुर्गा रूप से उस दुर्गम असुर का वध किया,जिसने चारों वेदों को ब्रह्मा से वरदान में  मांग लिया था।
 तथा
भ्रामरी रूप से अरुण नामक दैत्य का वध करने वाली महामाया।


शिव पुराण के अनुसार महाप्रलय में ग्रह, उपग्रह , सूर्य, चंद्र ,तारागण,जल, अग्नि, वायु, शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गंध आदि कुछ भी नहीं था। उस समय केबल एक सद ब्रह्मा ही व्यापक था।
उसी ब्रह्म ने सृष्टि काल आने पर   एक से अनेक होने का संकल्प किया ,फलस्वरूप स्वयं भी ईश्वर सदाशिव के रूप में प्रकट हुए,उन सदा शिव से एक अष्ट भुजा वाली देवी प्रकट हुईं,जो उनसे कभी अलग होने वाली न थी।
यह देवी  एवम् शिव तत्व दृष्टि से  एक ही हैं।
इसी देवी एवम् शिव ने स्वयं के लिए शिव लोक का निर्माण किया ,वाद में दोनों ने विष्णु की उत्पत्ति की ,उन्होंने शिव आज्ञा से तप किया ,इसके परिणाम स्वरूप उनसे कई जल धाराएं निकली जिससे सारा सूना आकाश जल से व्याप्त हो गया।
श्री हरि से सभी तत्व उत्पन्न हुए ,उन्हें ग्रहण कर 
 श्री हरि ने उस जल में शयन किया ,उनके शयन करने पर श्री हरि के नाभि कमल से शिव पुत्र ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए।
बाद में ब्रह्मा जी एवम् श्री हरि के बीच प्रभुत्व को लेकर विवाद हो गया जिसे दूर करने हेतु शिव ज्योतिर्लिंग रूप से प्रकट हुए,उन दोनों ने युद्ध रोक उसके ओर छोर का पता लगाने का प्रयास किया  ,उन्हें सफलता न मिली तब एक ऋषि का आना हुआ ,उससे परिचय प्राप्त कर श्री हरि एवम् ब्रह्मा जी ने उनका स्तवन किया फलस्वरूप शब्द ब्रह्म रूप से तथा बाद ने साक्षात रूप से दर्शन हुए। शिव एवम् शक्ति ने उन्हें ज्ञान दिया तत्पश्चात
वह आंनद वन को चले गए।
इसके बाद ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची।
सृष्टि रचने कि प्रक्रिया ने रूद्र उनके मस्तिष्क से प्रकट हुए तथा फिर बाद में कैलाश पर्वत पर रहने लगे।
यहां स्पष्टत: शिव एवम् शक्ति ब्रह्मा ,विष्णु व महेश से श्रेष्ठ हैं एवम् सभी देवता उनके है अंश हैं।

(पुराण - शिव पुराण,लिंग पुराण  आदि)


देवी शिवा ने चंड ,मुंड ,रक्तबीज आदि से कहा था कि - परब्रह्म परमात्मा महेश्वर जो सर्वत्र व्यापक  हैं तथा सदाशिव कहलाते हैं
उनकी मैं सूक्ष्म प्रकृति हूं ,उनके तत्व को वेद भी नहीं जानते ,तो विष्णु आदि देवता तो जान ही कैसे सकते हैं।।
(शिव पुराण ,उमा संहिता)

अब तो आप समझ गए होंगे कि शेरावाली माता दुर्गा के पति भगवान सदाशिव हैं जो शिवलोक के मालिक हैं।


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जय श्री हरि।


दुर्गम असुर का वध किसने किया था ?

Sandeep sihare

 Who was mother durga ?

दुर्गम असुर कौन था ? दुर्गम असुर का वध किसने किया था ?

शाकंभरी देवी किसका नाम है ?

रुरू  नामक

 असुर का पुत्र दुर्गम महा बलवान था ,उसने ब्रह्मा जी से वर पाकर चारों वेदों को अपने हाथों में ले लिया तथा देवताओं के लिए अजेय वल पाकर उसने धरती पर इसे कार्य किए जिससे स्वर्ग में देवता भी थर्रा उठे। वेदों के उस दुष्ट असुर के हाथ में जाने पर सारे संसार में वैदिक क्रिया नष्ट हो गई।

सारे लोग भ्रष्ट हो गए ,न यज्ञ होता ,न तप किया जाता था एवम् न ही होम वा दान आदि किया जाता परिणाम स्वरूप धरती पर १०० साल के लिए वर्षा बंद हो गई।
तीनों लोगों में हाहाकार मच गया, सब लोग दुखी हो गए, सबको भूख प्यास का महान कष्ट सताने लगा। कुआ तालाब नदियां एवं समुद्र आदि सूख गए। समस्त वृक्ष एवं लताएं सूख गई।इससे लोग भूंखों मरने लगे फलस्वरूप समस्त देवता योग माया की शरण में गए ।
देवताओं ने कहा - समस्त प्रजा की रक्षा करो रक्षा करो। हे देवी अपने क्रोध को रोको नहीं तो सब प्राणी नष्ट हो जाएंगे। हे माता ! जिस प्रकार से तुमने मधु - कैटभ , महिषासुर , चंड मुंड शुंभ निशुंभ आदि दैत्यों का वध किया है उसी प्रकार इस असुर का नाश करो। बालकों पर पल पल पर अपराध होता ही रहता है, केवल माता के अलावा ऐसा कोन है जो उस अपराध को सहन कर सके।
तुमने बार-बार हमारी रक्षा की है, हम आप की शरण में हैं, आप हमारी रक्षा करें।
तब देवी का ह्रदय करुणा से भर आया और उन्होंने अनंत नेत्रों से युक्त अपने रूप के दर्शन कराए, उनका मुखारविंद प्रसंता से खिला हुआ था

और वे अपने चारों हाथों में क्रमशः धनुष, बाण, कमल नाना प्रकार के फल मूल आदि लिए थीं।
प्रजा को कष्ट उठाते देख उनके आंसु निकल आए ,वह ९ दिन  एवम् ९ रात तक रोटी रहीं।उनके नेत्रों से हजारों जल धाराएं निकलने लगी ,जिससे नदी ,सरोवर एवम् सागर सभी पानी से भर गए।वृक्ष ,साग,ओषधियां  आदि पुनः अंकुरित हो गए।
स्वयं भागवत महा पुरुषों को अपने हाथ से फल देने लगी।
गायों के लिए सुंदर घांस ,अन्य प्राणियों के लिए भोजन की व्यवस्था की।
देवताओं ने देवी से कहा - आप वेदों को उस दुष्ट से छुड़ाकर हम लौटा दीजिए एवम् इस असुर का वध कर डालिए ।
तब देवी ने तथास्तु कहा 

फिर तो देवी ने उस असुर को युद्ध हेतु ललकारा देवी एवम् दैत्य के बीच भयंकर युद्ध हुआ।उस असुर की बहुत बड़ी सेना थी।
तब देवी ने अपने कई रूप बनाकर उन असुरों से युद्ध किया।
काली, तारा, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगुला, मातंगी एवं त्रिपुर सुंदरी आदि देवियों ने असुर सेना को नष्ट के डाला।
स्वयं भगवती शिवा का उस दुर्गम के साथ युद्ध हुआ।
अंत में देवी ने उस दैत्य को अपने त्रिशूल से मर डाला ।बची हुई सेना पाताल में घुस गई।
सारी त्रिलोकी में आंनद छा गया ,ढोल नगाड़े बजने लगे।
सब देवता आंनद ने भरकर देवी माता की स्तुति करने लगे।
देवता वोले - हे देवी ! आपने हमारे लिए कई नेत्रों से युक्त रूप धारण किया था इसलिए लोग आपको शताक्षी नाम से पुकारेंगे।
 आपने शाकों द्वारा समस्त प्रजा का भरण पोषण किया है इसलिए आपका नाम शाकंभरी होगा। देवी ! दुर्गा मां सुर का वध करने के कारण आप दुर्गा नाम से प्रसिद्ध होंगी।
सूर्य चंद्रमा  आपके नेत्र हैं, आप तक मनवाणी की पहुंच नहीं है आप ही परम पुरुष परमेश्वर हैं, हम आप की महिमा नहीं जानते। आप देवी को बार-बार नमस्कार करते हैं।
श्री देवी बोली - हे देवताओं ! 
देसी गाय अपने बच्चों को देखकर दौड़ी चली आती है उसी प्रकार में आप लोगों को कष्ट में देखकर दौड़ी चली आती हूं। तुम्हें ना देखने से मेरा एक क्षण भी बड़े कष्ट से व्यतीत होता है।
मैं तुम्हें अपने बच्चों के समान समझती हूं, तुम लोगों को कष्ट में नहीं देख सकती।
आगे भी जब तुम पर कष्ट आएंगे,मै उनका निवारण करूंगी।मै यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होऊंगी, इससे लोग मुझे नंद की पुत्री कहेंगे ,
भविष्य में शुंभ निशुंभ जो दूसरे असुर उत्पन्न होंगे,उन्हें नष्ट कर डालूंगी।।इसी तरह भ्रमर  का रूप धारण कर अरुण नामक असुर का वध करूंगी ,इस कारण लोग मुझे भ्रामरी कहा करेंगे।

भीम रूप धरकर  असुरों को नष्ट करूंगी ,तब मुझे लोग  भीमदेवी के नाम से पुकरेंगे। इतना कहकर 
 देवी माता अपने लोक को चली गईं।

बुधवार, 2 सितंबर 2020

शिवा के सरस्वती अवतार की कथा

Sandeep sihare

  देवी कौशिकी कौन थी ,उन्होंने शुंभ एवम् निशुंभ का वध क्यों किया था ?

सरस्वती(देवी कौशिकी) अवतार -

पूर्व काल में शुंभ एवं निशुंभ नामक  दो दैत्य थे ,जो आपस में भाई -२ थे,उन दोनों ने देवताओं को जीत लिया एवम् स्वर्ग में रहकर सारे संसार पर शासन करने लगे।

इससे दुखी होकर देवता हिमालय पर्वत पर जाकर देवी उमा की स्तुति करने लगे,इसी बीच देवी पार्वती स्नान हेतु गंगा तट पर आईं तब देवताओं से देवी ने कहा - आप लोग यहां किसकी स्तुति कर रहे हैं,उनके इतना कहते ही देवी गौरी के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई और बोली -, माते ! यह सभी देवता मेरी स्तुति कर रहे हैं ,क्योंकि यह शुंभ - निशुंभ से पीड़ित हैं।यह देवी के शरीर से प्रकट हुई ,सो कौशिकी कहलाती है। 

कौशिकी ने देवताओं से कहा - आप सब निर्भय होकर रहो , मैं स्वतंत्र हूं , अत: किसी का सहारा लिए बिना ही तुम्हारा सारा कार्य सिद्ध कर दूंगी। ऐसा कहकर देवी वहां से अदृश्य हो गईं।

एक दिन शुंभ एवम् निशुंभ के सेवक चंड - मुंड ने देवी को हिमालय के शिखर पर देखा ,उस मनोहर रूप को देखकर मोहित हो वह दोनों भूमि पर बेहोश हो गिर पड़े, होश में आने पर वह शुंभ एवम् निशुंभ के पास आए एवम् उनसे कहने लगे - महाराज !  हमने एक अपूर्व सुंदरी देखी है ,जो हिमालय के शिखर पर रहती है वा सिंह सवारी करती है।
तब शुंभ ने देवी के पास अपना संदेश दूत के माध्यम से भेज दिया।
दूत ने हिमालय शिखर पर श्री देवी को शुंभ का  संदेश  
सुनाया - शुंभ के शब्दों में
देवी ! मैंने युद्ध में समस्त देवताओं को हराकर उनके  दिव्य रत्नों का हरण कर लिया। तुम स्त्रियों में रत्न हो अतः मुझे अथवा मेरे भाई को पति रूप में स्वीकार कर लो।

शुंभ का संदेश सुनकर भूतनाथ शिव की प्रिया महामाया हंसकर उस दूत से बोली - दूत!
तुम सत्य कहते हो,तुम्हारे कथन में असत्य कुछ नहीं है किन्तु मेरी एक प्रतिज्ञा है कि जो मुझे युद्ध में जीत ले,मेरे घमंड को चूर -  २  कर दे ,वही मेरा पति होगा।मेरा यह सन्देश तुम शुंभ एवम् निशुंभ को दे दो,वाद में वो जैसा उचित समझें, करें।
सुग्रीव दूत ने वहां से लौटकर शुंभ और निशुंभ को सब कुछ बता दिया।

तब तो उसने अत्यन्त कुपित हो धूर्माक्ष को सेना सहित देवी से लडने भेजा। देवी की हुंकार मात्र से  वह जलकर राख हो गया 
तब तो फिर उसने रक्तबीज , चड- मुंड  आदि को भेजा 
,वह सभी हिमालय पर आकर देवी से कहने लगे,- देवी ! तुम शुंभ  निशुंभ के पास चलो ,नहीं तो तुम्हे गण एवम् वाहन सहित मरवा डालेंगे।
 तुम शुंभ अथवा निशुंभ को पति के रूप में स्वीकार कर लो ।।

तुम्हें उस सुख की प्राप्ति होगी,जो देवताओं को भी दुर्लभ है।

उनकी बातों को सुनकर देवी वोली - अद्वितीय महेश्वर परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र विराजमान हैं, जो सदाशिव कहलाते हैं। वेद भी उनके तत्व को नहीं जानते,फिर विष्णु आदि की तो बात ही क्या है।उन्हीं सदाशिव की मैं सूक्ष्म प्रकृति हूं फिर दूसरे को पति कैसे बना सकती हूं।सिंहिनी कितनी भी कामातुर क्यों न हो जाए ,वह गीदड़ को कभी अपना पति नहीं बनाएगी।
तुम सब लोग गलत बोलते हो तथा काल के फनदें में फंसे हो।
अत: पाताल लोक को लौट जाओ।
चंड, मुंड आदि दैत्य  बोले - हम तुम्हें अबला समझ रहे थे ,अब तुम युद्ध के लिए तैयार रहो,इस प्रकार कलह बड़ने पर बड़ा भारी युद्ध होने लगा,देवी का सिंह भी युद्ध करने लगा।
कालिका देवी  का चंड - मुंड के साथ युद्ध हुआ,बाद में उन्होंने उन दोनों का वध कर दिया। रक्तबीज के साथ महामाया का युद्ध हुआ,रक्तबीज को शिव का वरदान था कि जैसे ही उसकी रक्त की बूंद धरती पर गिरेगी,तुरन्त एक नया रक्तबीज पैदा हो जाएगा । इस कारण से रक्तवीज को मारना कठिन हो रहा था ,तब देवी ने काली से कहा कि तुम रक्त को धरती पर गिरने से पहले उसे भक्षण कर लिया करो। कालिका देवी के ऐसा करने पर शिवा देवी ने  उसको मार डाला।

इसके बाद कई वीर आए तथा स्वयं निशुंभ भी आया परंतु सबके सब देवी के हाथों मारे गए।
निशुंभ के मारे जाने पर शुंभ क्रोध के मारे पागल हो गया था वह अष्ट भुजा धारण करके युद्ध क्षेत्र में अंबिका के पास आया।उसने संख बजाया ,बड़े जोर का गर्जन किया।तब देवी के सिंह ने भी गर्जना  की,इससे आकाश गूंज उठा।
इसके बाद शुंभ एवम् देवी का बड़ा भयंकर युद्ध हुआ।
वह दैत्य भी बड़ा बली था,शूल का घातक प्रहार सहन कर गया।देवी पर उसने चक्र से प्रहार किया,जिसे देवी ने चक्र से ही काट डाला।

कभी वह तीर से, तो तलवार से  आक्रमण करता,परंतु देवी उसके अस्त्रों को नष्ट कर डालती। कालिका एवम् सिंह भी युद्ध में शत्रु सेना को नष्ट कर रहे थे।
अब देवी ने त्रिशूल से उस पर प्रहार किया ,जिससे वह मृत्यु को प्राप्त हो गया।
शुंभ के मारे जाने पर बचे हुए दैत्य पाताल में घुस गए।
स्वर्ग में ढोल नगाड़े बज उठे, गंधर्व गीत गाने लगे ,सारे देवता सुख को प्राप्त हो गए।सबने देवी की आरती उतारी ,पूजन किया।
महामाया  वा कालिका ने अपनी शक्ति से समस्त असुरों को पराजित करके देवताओं को उनका हरा हुए राज्य वापस कर दिया ।
इसके बाद देवी माता पार्वती में लीन हो गई।वह दोनों परमपद के भागी हुए।
इस उमा चरित को जो कोई श्रवण करता है,वह उमालोक को प्राप्त होता  है। 

देवी शिवा के महालक्ष्मी अवतार की कथा

Sandeep sihare

 Who was mahishasur ?  

महालक्ष्मी अवतार -

देवी उमा के महालक्ष्मी अवतार की यह कथा शिव पुराण,देवी पुराण,दुर्गा सप्तशती के अनुसार है। 

महिषासुर कौन था ? एवम् महिषासुर को मारने वाली देवी कौन थीं ?
 उत्तर -
रंभ नाम से प्रसिद्ध  एक असुर था,उससे महिष दानव का जन्म हुआ ,उसने ब्रह्मा जी के वर प्रभाव से देवताओं को युद्ध में जीत लिया  एव  स्वर्ग में रहकर संपूर्ण जगत का शासन करने लगा।
इस तरह शासन करते हुए उसे बहुत समय निकल गया ,तब देवता बहुत दुखी होकर ब्रह्मा जी के पास आए।ब्रह्मा जी उन समस्त देवताओं को लेकर उस स्थान पर गए, जहां शिवजी एवम् विष्णु जी उपस्थित थे।

वहां पहुंचकर उन्होंने महादेव वा श्री हरि को अपना दुख सुनाते हुए   कहने लगे -"मैं महिषासुर ने युद्ध में हम सब देवताओं को जीत कर स्वर्ग लोक से  बाहर निकाल दिया है। इसलिए हम मृत्यु लोक में भटक रहे हैं, हमें कहीं भी शांति नहीं मिल रही है।
उस असुर ने इंद्र आदि देवताओं की क्या क्या दुर्दशा नहीं की है
सूर्य चंद्र वरुण कुबेर यम इंद्र अग्नि वायु गंधर्व तथा चारण - इन सबके तथा अन्य देवताओं के जो भी कर्तव्य कर्म है, उन सबको वह स्वयं ही करता है। उसने  असुर  पक्ष को अभय- दान कर दिया है। इसलिए हम सब देवता आप की शरण में आए हैं। आप दोनों हमारी रक्षा करें और उस असुर के वध का उपाय स्वयं सोचें , क्योंकि आप दोनों ऐसा करने में  समर्थ हैं।

देवताओं की बात सुनकर वह दोनों बहुत क्रोधित हो गए।
क्रोध करने पर उनके मुख तथा अन्य देवताओं के शरीर से तेज प्रकट हुए,वह सब तेज आपस मिलकर एक नारी के रूप में परिणत हुए।


देवी का मुख शिव तेज से ,भुजाएं विष्णु  तेज से ,केश यम तेज, से,स्तन चन्द्र तेज से, कटी भाग इन्द्र तेज से ,जांघ एवम् उरू क्षेत्र वरुण तेज से उत्पन्न हुए, धरती के तेज से नितम्ब,ब्रह्मा के तेज से चरण उत्पन्न हुए आदि
अर्थात सभी देवताओं के तेज से श्री देवी का विग्रह निर्मित हुआ।सभी देवों ने उन्हें अपने -२ हथियार दिए।शिव ने त्रिशूल ,विष्णु ने चक्र तथा ब्रह्मा ने कमंडल एवम् क्षीर सागर ने वस्त्र भेंट किए।हिमवान ने सवारी हेतु सिंह दिया,यम ने काल दंड ,प्रजापति ने अक्ष माला दी।
कुल मिलाकर जिस देवता के पास जो देने योग्य था,वह देवी को अर्पित किया।
फिर देवी ने उच्च स्वर से गरजना कि,उस नाद को सुनकर सारी त्रिलोकी में हलचल मच गई।देवता एवम् देवियां उन जगदम्बा की जय - जयकार करने लगे।
यह आवाज महिषासुर तक पहुंची,फिर वह सेना के साथ युद्ध क्षेत्र में आया ,उसके सेनापति एक एक कर आए एवम् देवी के हाथों मौत को प्राप्त कर गए।उनमें मुख्य नाम इस प्रकार से हैं जैसे चिक्षुर,चामर,कराल ,वाष्कल,ताम्र , विडाल,अंधक,दुर्मुख आदि।अंत में देवी का महिषासुर के साथ भयानक युद्ध हुआ
,जिसे देखकर देवता भयभीत होने लगे,वह धूर्त कपट युद्ध करने पर उतारू हो गया तब देवी बोली - र मूर्ख ! तेरी बुद्धि मारी गई है,तू व्यर्थ हट करता है।तीनों लोक में कोई भी मेरे सामने ठहर नहीं सकता।
यों कहकर देवी ने अपने पैर से दबाकर उसके कंठ में शूल में प्रहार किया,वह दूसरे रूप से बाहर निकल ही रहा था कि देवी ने उसे अपने प्रभाव से रोक दिया एवम् तलवार से उसका सिर धड से अलग कर दिया।बची हुई सेना भयभीत होकर पताल लोक को लौट गई।

देवी माता की इस जीत से स्वर्गमे दुंदुभी बजने लगी, देवता नाचने तथा गाने लगे,चारों ओर देवी की जय जयकार की जाने लगी।देवता बहुत खुश हो गए,उनके सारे मनोरथ देवी ने पूरी कर दिए।
समस्त देवताओं ने देवी की आरती उतारी ,इसके बाद देवी स्वधाम को चली गई।
इस तरह से यह महालक्ष्मी का अवतार पूर्ण हुआ।

विशेष - देवी भागवत में यह कथा बहुत विस्तार से दी गई।

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  • Syed Faizan AliMaster / Computers
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